संदेश

भव्य

प्रश्न जटिल उत्तर से पूछा कैसे वक्तव्य करूं अगर हल हो तुम मेरे प्रश्नों का  तो हल किसे कहूं नयन मेरे बंजर और तू है सावन की हरियाली मेरे ख्वाब खंडहर  और तू है फूलों सी मतवाली झरनों के झर झर में सुनता रहता तेरा मधुर गान बीच बसंत बैठ  मै लूं तेरे रूप का रस पान कैसे बोलूं कैसे तोलूं रूप तेरा संगम सा जैसे यमुना और गंग में  हुई विलीन सरस्वती हुआ विलीन मगन मै तेरी मधुर संस्मृति।

घड़ी

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हम भ्रमित हैं और हैं मगन आंखों में है धुंधलापन कुछ दिख रहा है दूर जो बिल्कुल नहीं स्पष्ट  क्या है वो  क्यों बढ़ रहा कैसा रहा आतंक! ये बात है उस रात की जिस रात में गहरा घना अंधेरा था प्रखर बैठक वहीं पे हो रही और बातें कहीं की हो रही हकलाते हुए , दिखलाते हुए कुछ खोखले से बंक में संदूक थे या थे तने! मै खड़ा था द्वंद्व में किस घड़ी की खोज में मै गया सकुचाते हुए दुबके हुए से थे कदम लेकिन उन्हें देख कर खीसें मगर निपोर दी हम हस पड़े और वो  बड़ी फॉर्मल सी बात थी कुछ खुदबुद हुई निकला चला न रुका बढ़ता रहा चुपचाप  शिकायतों–उम्मीदों–टूटती–खनकती–झनझनाती–कल्पनाएं टिकटिक करती घड़ी मेरी दिल की धड़कनों की दौड़  सब कुछ मिलाकर हैरान था कुछ समझता तब तक हो चुकी थी  चिचिहाट हल्की लालिमा सब स्पष्ट था ये तो स्वप्न था गहरा बड़ा  और उलझा हुआ सुलझा मगर अभी न था। ©️हर्षित तिवारी

झोंके

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झोंके ___________________________________ हवाओं में उस दिन तीखापन था , तेज झोके खिड़कियों , दरवाजों और गेट को खटाक से ढकेल के जाती और फिर वापस आ के वही प्रक्रिया दुहराती। आसमान में बिजली की चमक उलझे हुए माझे की तरह दिखाई पड़ रही थी। बाहर मुंह निकालते ही तेज ठंडे झोंके से शरीर में कपकपी सी लगती। घुप्प अंधेरा था और कभी कभी बारिश की कुछ बूंदें खिड़की के लाख बंद करने के बाद भी अंदर ही जाती थीं। हल्के पतले चद्दर से लिपटे हुए अकेले बैठे बाहर देख रहा था। लेकिन! क्या? कुछ दिखाई तो नहीं पड़ रहा था तब  भी आंखों में चित्र बन रहे थे। चित्रों में कई स्मृतियां थीं। उन स्मृतियों में बार बार धुंधले दृश्य उभर के आते थे , कुछ जाने पहचाने से। अभी रात तो नही हुई थी लेकिन न जाने क्यों बादलों के आने से अंधेरा हो गया था। यही कोई घड़ी में पांच बजे होंगे। कुंवार के महीने में शरद ऋतु का आगमन हो जाता है लेकिन अनायास आई बारिश और तेज हवाएं … बैठे बैठे बोर हो भी रहा था कुछ करने का मन भी नहीं था तभी ये सब घट गया और बादलों के आने से मेरे मन के तार खिंच जाते हैं जैसे गिटार के तार को तेजी से खींच के छोड...

उमस

उन दिनों बहुत गर्मी थी आसमान की तरफ देखो तो वो आग उगल रहा था। छोटी पतली सी पकी ईंटों और गारे की दीवार कुछ अलग ही रौब बनाए खड़ी थीं। पेड़ों से भाप निकलती दिखाई पड़ रही थी पत्तियां कुम्हलाई हुई थी। हवा बिल्कुल शांत थी। बंदर भी अपनी धमा चौकड़ी भूल चुके थे। गाएं बैठी थीं लेकिन उनके पेट तेजी से ऊपर–नीचे ऊपर–नीचे हो रहे थे। कुत्ते बड़ी सी जीभ निकाले हांफते हुए इधर उधर भाग रहे थे। नीम के पेढ़ के नीचे कुछ बच्चे विचित्र खेल खेलने में मग्न थे। मै भी पुरानी जंग लगी खिड़की से बाहर देखे जा रहा था। धन्नी में लगे सीलन खाए ईंटों के बीच में कमल के चिन्ह जैसी आकृति बनी थी। आसपास का माहौल गुमसुम सा बना हुआ था।