झोंके ___________________________________ हवाओं में उस दिन तीखापन था , तेज झोके खिड़कियों , दरवाजों और गेट को खटाक से ढकेल के जाती और फिर वापस आ के वही प्रक्रिया दुहराती। आसमान में बिजली की चमक उलझे हुए माझे की तरह दिखाई पड़ रही थी। बाहर मुंह निकालते ही तेज ठंडे झोंके से शरीर में कपकपी सी लगती। घुप्प अंधेरा था और कभी कभी बारिश की कुछ बूंदें खिड़की के लाख बंद करने के बाद भी अंदर ही जाती थीं। हल्के पतले चद्दर से लिपटे हुए अकेले बैठे बाहर देख रहा था। लेकिन! क्या? कुछ दिखाई तो नहीं पड़ रहा था तब भी आंखों में चित्र बन रहे थे। चित्रों में कई स्मृतियां थीं। उन स्मृतियों में बार बार धुंधले दृश्य उभर के आते थे , कुछ जाने पहचाने से। अभी रात तो नही हुई थी लेकिन न जाने क्यों बादलों के आने से अंधेरा हो गया था। यही कोई घड़ी में पांच बजे होंगे। कुंवार के महीने में शरद ऋतु का आगमन हो जाता है लेकिन अनायास आई बारिश और तेज हवाएं … बैठे बैठे बोर हो भी रहा था कुछ करने का मन भी नहीं था तभी ये सब घट गया और बादलों के आने से मेरे मन के तार खिंच जाते हैं जैसे गिटार के तार को तेजी से खींच के छोड...