झोंके

झोंके

___________________________________

हवाओं में उस दिन तीखापन था , तेज झोके खिड़कियों , दरवाजों और गेट को खटाक से ढकेल के जाती और फिर वापस आ के वही प्रक्रिया दुहराती। आसमान में बिजली की चमक उलझे हुए माझे की तरह दिखाई पड़ रही थी। बाहर मुंह निकालते ही तेज ठंडे झोंके से शरीर में कपकपी सी लगती। घुप्प अंधेरा था और कभी कभी बारिश की कुछ बूंदें खिड़की के लाख बंद करने के बाद भी अंदर ही जाती थीं। हल्के पतले चद्दर से लिपटे हुए अकेले बैठे बाहर देख रहा था। लेकिन! क्या? कुछ दिखाई तो नहीं पड़ रहा था तब  भी आंखों में चित्र बन रहे थे। चित्रों में कई स्मृतियां थीं। उन स्मृतियों में बार बार धुंधले दृश्य उभर के आते थे , कुछ जाने पहचाने से।

अभी रात तो नही हुई थी लेकिन न जाने क्यों बादलों के आने से अंधेरा हो गया था। यही कोई घड़ी में पांच बजे होंगे। कुंवार के महीने में शरद ऋतु का आगमन हो जाता है लेकिन अनायास आई बारिश और तेज हवाएं … बैठे बैठे बोर हो भी रहा था कुछ करने का मन भी नहीं था तभी ये सब घट गया और बादलों के आने से मेरे मन के तार खिंच जाते हैं जैसे गिटार के तार को तेजी से खींच के छोड़ दो तो झन्न की आवाज आती है। वैसा ही हुआ। मेरा मोह वर्षा ऋतु से है या मेरा मन वहीं जा के टिक जाता है कुछ समझ नहीं आता। आषाढ़, सावन और भादव अभी अभी ही तो गुजरे थे और फिर से आज ये क्या हो रहा था। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मुझे पीछे खींच के कोई ले जा रहा है गहरे अंधेरे कुवें में। मै गिरता जा रहा हूं गहराई में नीचे या ऊपर की ओर , बस गिर रहा था तभी अचानक आवाज आती है मोर की।

हराभरा मैदान था जिसमें छोटी छोटी चिकवड़ उग गई थी। गेंदा के पेंढ़ उग रहे थे। चिलवल के नन्हे पौधे भी मस्ती में झूम रहे थे। दूर दूर तक बस हरा ही हरा दिखाई पड़ रहा था। आकाश में भी बादलों की धमाचौकड़ी हो रही थी। छाड़ में सरसराहट सी हो रही थी लगता है बिलों में पानी जाने से उनके गृह त्याग का समय है और वे भी घबराए से भाग रहे हैं। तीतर तेजी से भागते हुए दिखाई दिए और वो भी कहीं जाके गुम हो गए। कुछ पक्षियों का झुंड आया है जो नीम के पेड़ में बैठ के कुछ वार्ता कर रहा था। बड़ा शोरगुल था। मोरों के नृत्य भी चालू थे। कहीं कहीं गुलाबी कीट मस्त घूम रहे थे जिन्हे किसी के नन्हे हाथ उठाने को आतुर थे , कितने गुलगुले और मुलायम थे। कई कोई उन्हें राम जी की गुड़िया भी कहा करता था। उनका रंग बड़ा प्यारा होता था। चींटियों का भी दल लेफ्ट राइट , लेफ्ट राइट करता हुआ बढ़ रहा था। लाल और भूरे रंग की चींटी। कुछ कीड़े इधर उधर घूम रहे थे। 

छह बिंदी वाला कीड़ा। देखते ही मै भागा । सुना है की उसके काटने से छह मिनट , छह साल या पता नहीं लेकिन लोग मर जाते हैं। भागते भागते ‘गराज’ देखा , उखाड़ के हाथ में ले लिए चलो आज इसकी सब्जी बनेंगी। कुछ कुंभी उखाड़ के रख लिया। उन दिनों बड़ी मारा–मारी थी कुंभी और गराज की सब्जी  के लिए कई वीर जंगलों में भटका करते थे। और ये होते भी दुर्लभ जगहों पे। 

न जाने क्यों मुझे ये सारे चित्र दिख रहे थे। मै मदहोश खोया हुआ बैठा था। कब रात हो गई कुछ पता नहीं चला। मै उठा और बाहर झांक के देखा तो आसमान खुल आया था चंद्रमा भी चटक रंग में दिख रहा था और टिमटिमाते तारे बड़े खुश दिख रहे थे। मै जल्दी से आया और अब आगे कुछ और न करने और थकान के भारी मन से चद्दर ओढ़ के पुनः उसी घुप्प अंधेरे में निद्रा की ओर बढ़ चला…

©️हर्षित तिवारी 

नोट – मन के चल रहे द्वंद्व किसी न किसी माध्यम से फूटते हैं अब ये आप पे है आप उन्हें खुद से जोड़ लाते हैं या मात्राओं , ज्ञान का दंभ लिए हुंह करके निकल जाते हैं।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

घड़ी