घड़ी
हम भ्रमित हैं
और हैं मगन
आंखों में है धुंधलापन
कुछ दिख रहा है दूर जो
बिल्कुल नहीं स्पष्ट
क्या है वो
क्यों बढ़ रहा
कैसा रहा आतंक!
ये बात है उस रात की
जिस रात में गहरा घना अंधेरा था प्रखर
बैठक वहीं पे हो रही
और बातें कहीं की हो रही
हकलाते हुए , दिखलाते हुए
कुछ खोखले से बंक में
संदूक थे या थे तने!
मै खड़ा था द्वंद्व में
किस घड़ी की खोज में
मै गया सकुचाते हुए
दुबके हुए से थे कदम
लेकिन उन्हें देख कर
खीसें मगर निपोर दी
हम हस पड़े और वो
बड़ी फॉर्मल सी बात थी
कुछ खुदबुद हुई
निकला चला न रुका बढ़ता रहा चुपचाप
शिकायतों–उम्मीदों–टूटती–खनकती–झनझनाती–कल्पनाएं
टिकटिक करती घड़ी मेरी दिल की धड़कनों की दौड़
सब कुछ मिलाकर
हैरान था
कुछ समझता तब तक
हो चुकी थी
चिचिहाट
हल्की लालिमा
सब स्पष्ट था
ये तो स्वप्न था
गहरा बड़ा
और उलझा हुआ
सुलझा मगर
अभी न था।
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